Tuesday, September 29, 2015

आदतें अक्सर काम आसान कर देती हैं

बहुत सी चीजें जाने अनजाने में कब जिंदगी में आकर
जुड़ जाती है कहाँ पता चलता है। गर्मी अब लगती ही
नहीं है चाहे जितनी हो। काली टीशर्ट या गहरे रंग के
कपड़े जिस दिन निकालता हूँ उसी दिन वो पसीने में
इतने गीले हो जाते हैं कि पसीना सूख कर सफेद लाईन
सी बना देता है। अगले दिन के लायक नहीं बचते। हर
समय पसीना पसीना होता रहता है। वजन बहुत बढ़
गया है। 2013 में जब झाड़खंड छोड़ा था तब 56
किलो वजन था आज 75 के करीब है। बाल पिछले तीन
चार महीने से तेज रफ्तार से सफेद हो रहे हैं। दिन भर में दस बारह कप चाय हो ही जाती है। रात को बारह
दो बजे के कॉल सभी नींद में रिसीव कब हो जाते हैं
पता ही नहीं लगता एक बार सुबह एक आदमी बोलने
लगा आपने रात में तीन बजे बोला था आप ये काम
करवायेंगे आपने करवाया नहीं। मुझे याद ही नहीं रहा
उससे क्या बात की कब बात की। फोन में देखा तो
कॉल रीसिव्ड था। अच्छा खाने
का अब मन नहीं करता। रूम पर टीवी है डिश वाली पर
दो महीने से नहीं देखी। पता नहीं क्यूँ। शायद अब मन
नहीं होता। मुझे अब
ये भी अजीब नहीं लगता। ये सब कुछ पहले बहुत अजीब
लगता था। सब छोड़ छाड़ के भागने का मन करता था।
लगातार आदमी इस माहौल में रहे तो ब्रेकडाऊन
टाईप्स स्थिती हो जाती है। अब हर चीज एक अपना
ही हिस्सा लगती है। हर चीज पर रीएक्शन साईकल के
सामने कोई चीज आने पर ब्रेक लगाने जैसा है अपने आप
लग जाता है। किस्से अब और नजर नहीं आते शायद वो
अब हिस्से बन चुके हैं हो सकता इसलिये ऐसा हो। खैर
जो भी हो। आदतें अक्सर काम आसान कर देती हैं।
आदतें जरूरी है। हिस्सा बनाने के लिये। किस्सों के
लिये तो खैर पूरी ज़िंदगी पड़ी ही है।

Tuesday, January 13, 2015

झारखंड का महापर्व टुसु

झारखंड का महापर्व टुसु का एक
माहव्यापी आयोजन मकर संक्रांति के दिन समाप्त
होता है।इस दिन बच्चे बुढ़े महिलाएं सभी पास के
नदी टुसु-चौड़न लेकर जाते है। वहां टुसु को विदाई
दी जाती है और स्नान कर "पुसपिठा" खाते
है।टुसु के बारे मे सटीक
जानकारी नही रहने के कारण कई
भ्रांतियां फैल गई है। कोई कहते है कि टुसु काशीपुर
के राजा की पुत्री थी तो कोई टुसु
को किसी कुड़मी जमींदार
की साहसी कन्या के रुप मे चित्रित करते
है। परंतु काशीपुर राजघराने के रिकार्ड मे
ऐसी किसी कन्या का कोई जिक्र तक
नही है तथा किसी अंजाने
जमींदार
की कन्या का भी झारखंड-बंगाल के इतिहास
गाथाओं मे जिक्र नही पाया गया है। तो टुसु है क्या?
वास्तव मे अलिखित इतिहास
की झारखंडी सभ्यता संस्कृति के अनेक
अमूल्य धरोहर मिटते गये है पर
जो अभी भी बचे है वो इसलिए कि उन्हे
पर्व के रुप मे जनजीवन का अंग बनाकर रखा गया है।
दरअसल, सदियों से चौतरफा सांस्कृतिक आक्रमणो की मार
से असली झारखंडी संस्कृतियां लगभग मिट
गई या उनका कायांतरण हो गया है । इससे इन त्योहारों का मूल भाव
को समझना काफी कठिन हो गया है।फिर
भी शोध करते करते कई के मूलभाव स्पष्ट हो चले
है। इसी संदर्भ मे 'टुसु' के बारे मे यह स्पष्ट हुआ
है कि टुसु न तो कोई राजकन्या थी और न
जमींदार की बेटी। यह
दरअसल यहां के कृषिजीवी जनमानस
की अन्नरुपी "मातृशक्ति"
थी जिसे 'डिनि-टुसुमनि' कहा जाता है।आदिकाल से जब
हमारे पुरखो ने अन्न उगाकर जीवनयापन करना आरंभ
किया तभी से उन्होने यह महसूस किया कि जिस
धरती माता के कोख से उत्पन्न अन्न के
द्वारा सृष्टि का स्वतः-संचालन होता आ रहा है तथा मानव
जीवन पुष्पित-पल्लवित हो रहा है उस
प्रकृति की मातृशक्ति की आराधना करके
ही मानव
अपनी संतति की रक्षा कर सकता है।
इसी के तहत खेतो से अन्न के घर आने और इससे
जीवन संपन्न होने का प्रतीक स्वरुप डिनि-
टुसुमनि की आराधना एक माह पर्यंत करने का विधान
है।इस अवधि मे कृषक-बालाएं
इनको अपनी संगी मानती है
जिसे पुनः अगले वर्ष आने को कहते हुए
जलरुपी ससुराल विदा कर दिया जाता है। अतएव, वाकई
टुसु
झारखंडी संस्कृति की मातृशक्ति का जीवंत


प्रतीक है।
 

Wednesday, December 17, 2014

Black Day for the whole World


जब स्कूल से घर आता था तो माँ देखती थी की कहीं घुटने में चोट तो नही लगी , आज उस माँ की सोचो जिसका बेटा स्कूल से घर नहीं
आएगा। उस बाप की सोचो जिसका बेटा स्कूल जाना नहीं चाह रहा होगा ,ज़बरदस्ती पापा school बस तक छोड़ के आये होंगे। वो बच्चा जिसने अपना Home work देर रात तक बैठ के पूरा किया था की सुबह टीचर assignment में ' Very Good ' देगी और वो टीचर जो अपने घर की अकेली bread winner थी को ज़िंदा जला दिया। ऑस्ट्रेलिया , फिर कल पाकिस्तान , Its not a war on a Religion but on Humanity

Some love stories never end, they just get jeopardized.

जब पहली बार उसे देखा था तो समझ
गया था की she is out of my league है।
वो मासूम सी शकल लिये और बालों में plates बना के
आती थी। यकीन मानिये
मेरी attendence का 75% हिस्सा उसके कारण
ही था। सुबह सुबह जब वो class में
आती थी तो मानो लोंडो के दिल
की धड़कन रुक जाती थी।
कई बार valentine's day आया और चला गया; लोग
children's day मना बैठे और मैं बस उसको propose करने
का सोचता रहा। आज इतने साल हो गए हैं पर सच मानिये आज
भी लड़कों के लिए propose करना viva देने से कम
नहीं है।
एक दिन गलती से facebook पे friend request
भेजने की सोची। school pass हुए
तो अरसा हो गया था और मन में ये सवाल था की मैं उसे
याद रहूँगा की नहीं। खेर हिम्मत-ए-
मर्दा मदद-ए-खुदा सोचके friend request भेज
ही दी। Tata docomo के 2g में एक
पेज खोलने में उतना ही समय लगता है
जितना influenza के antigenic shift होने में।।
आख़िरकार मैंने friend request भेज
ही दी। facebook महाशय ने एक
पुलिस वाले की तरह सवाल किया की 'do
you know her personally' अजी सच बोलने के
तो कई मौके मिलेंगे, साला facebook से क्या सच बोलना। मैंने फ़ौरन
ही हाँ पे click कर दिया और
मेरी friend request
मोदी की आकांक्षाओं
की रफ़्तार से भी तेज़
रवाना हो गयी। कई लोग रवाना को खाना पढ़ते हैं, ऐसे
लोगों के साथ मेरी हमदर्दी है। और
friend request भेजते ही 175 और लोगों के साथ
मैं भी उसका follower हो गया।।
5-6 दिन के बाद मुझे facebook पे एक message आया।
उसका ही message था 'Hi nice to see you
on facebook'
अच्छा जी, ज़िन्दगी में 475 बार आपके
सामने आया तब
कभी ख़ुशी नहीं हुई, आज
facebook पे ऐसा क्या हो गया। मैंने भी जोश में
आकर लिख दिया
'hi priya ya long time'
Priya : Ya, how are you? What are you upto
these days?'
राशिफल के हिसाब से तो आज मेरी राशि में दुःख दर्द
मिलने थे, ये अचानक बहार कहाँ से आ गयी।
वो अगले 20 मिनट IIT
की कहानी सुनाती रही जहाँ वो और
अविनाश मस्ती कर रहे थे और मैं तूफ़ान
की रात में दिए की तरह जलता रहा। जब
तक patience था सुना फिर goodbye लिखकर facebook से
उसे block कर दिया।।
"अगर किसी चीज़ को दिल से
चाहो तो पूरी कायनात तुम्हे उससे मिलाने में लग
जाती है" Om shanti om में शाहरुख़
यही कहकर Deepika को पटा लेता है।। पर हर
चीज़ bollywood movies
जैसी नहीं होती। कुछ दिन
सोच सोच कर बहुत आंसू बहा लिए फिर relationship status
'its complicated' लिखकर logout कर लिया।।
सुना है अविनाश और
प्रिया की शादी हो गयी है।
और मैं आज भी Old Monk रम में
अपनी priya को ढूंढ रहा हूँ।
Some love stories never end, they just get
jeopardized.

बाय बाय ‘ऑरकुट’



इंजिनियरींग कॉलेज मे दोस्तों के बाद ऑरकुट ही तो था,जिसने
पहली प्रेम-पत्री पहुंचाई
थी,उसको इम्प्रेस करने के लिए कितने सारे दोस्तों के
हाथ-पैर जोड़ के बढ़िया से टेस्टीमोनियल लिखवाए
थे...ऐसे ही घंटो बिता दिया करते
थे,अनजानी प्रोफाइल देखते देखते,और मेरे एक
परम मित्र ने जो लड़कियों की फोटो इकठ्ठा कर के
उनका एक कलेक्शन वाला 4 GB का फोल्डर बनाया था,वो आज
भी तो उसके कंप्यूटर
की सी ड्राइव में विंडोज के बूट फोल्डर
के अन्दर फोंट्स वाले फोल्डर में पड़ा हुआ है.
ऑरकुट से पहली बार सोशल
मीडिया के बारे में जाना,अनजाने लोगों से बात
करने,अपनी बात रखने की हिम्मत
जुटा पाया,अपना दायरा बढ़ा पाया| कॉलेज की उन तमाम
यादों में ऑरकुट और उससे जुड़े कई किस्से आज
भी सालों बाद मिलने पर मुस्कराहट के कारण बनते
हैं|
आज ऑरकुट बूढा हो गया,90 के मध्य दशक में पैदा होने
वालों के लिए फेसबुक, ट्विटर और whatsapp बेस्ट थिंग
है.पर 80 के दशक में पैदा हुए लोगों के लिए ऑरकुट आज
भी कई यादें समेटे हुएआज ऑरकुट
की हालत
आडवाणीजी जैसी हो गयी है,घर
के उपेक्षित बुजुर्ग जैसी|
अभी फेसबुक है.....कल कुछ और
नया आएगा..वक़्त सब का आता है...समय
किसी के लिए नही रुकता....
बाय बाय ‘ऑरकुट’